Saturday, 12 October 2013

देश की वर्तमान दशा और बुद्धिजीवी

उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के इस दौर ने मनुष्य को बाजार की वस्तु बना दिया है। उसका इसी आधार पर आकलन होने लगा है। विदेशी पूंजी अपने साथ अपनी सभ्यता लेकर आती है। इसका हमला प्रत्यक्ष रूप से दिखार्इ नहीं देता। लेकिन दिल-दिमाग के भीतर तक पैठ बना लेता है। राजनीतिक गुलामी प्रत्यक्ष होती है। अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया था। अपने शासन को स्थायित्व देने के लिये उन्होंने राजनीतिक व प्रशासनिक मोर्चे को अपर्याप्त माना था। इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों को उन्होंने समय से पहले समझ लिया था। वह जानते थे कि ब्रिटिस शासकों के खिलाफ भारत के लोग आन्दोलन कर सकते हैं। शासक जब सामने होते हैं, उनसे लड़ा जा सकता है। उनकी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है। बि्रटिश शासकों के सामने ऐसी परिसिथतियां सामने आयी थीं। इसलिए उन्होंने अपने को प्रशासनिक-राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा था। सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र को भी योजनाबद्ध ढंग से प्रभावित करने की रणनीति पर अमल किया। वह भारतीयों के ऐसे वर्ग का निर्माण चाहते थे, जो मानसिक रूप से पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के वशीभूत हो। उसका रंग भले ही काला हो, लेकिन जीवन-शैली अंग्रेजों जैसी हो। अंग्रेजों की दिखने की उसमें इच्छा हो। अंग्रेजी भाषा पर उसे गर्व हो। भारतीय सभ्यता-संस्कृति में उसका लगाव न हो। मैकाले की सोच चल निकली। अंग्रेज भारतीयों का ऐसा वर्ग बनाने में सफल रहे। लेकिन उस समय भी भारतीय चिन्तन से प्रभावित बुद्धिजीवियों की समानान्तर धारा प्रवाहित हो रही थी। वह जानते थे कि भारतीय समाज में कतिपय कमियां हो सकती हैं। जातीय भेदभाव हो सकते हैं। 
लेकिन इसका समाधान अंग्रेज नहीं कर सकते। वह अपना स्वार्थ पूरा करने के लिये भारत में थे। भारत का हित करना उनका उद्देश्य नहीं था। उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। ऐसे ही बुद्धिजीवियों ने स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार का नारा बुलन्द किया। महर्षि अरविन्द जैसे लोगों ने बेडि़यों में जकड़ी भारत माता के रूप से लोगों को परिचित कराया। यहां के सभी लोग भारत माता की सन्तान हैं। इस आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह चिन्तन भी कोर्इ नयी नहीं था। यह प्राचीन भारतीय विरासत थी। समस्याएं बाद में उत्पन्न हुर्इं। लेकिन अंग्रजों के लिये यह अच्छी बात थी। फूट डालो राज करो की नीति पर उनका चलना आसान था। बि्रटिश सत्ता से सुधार की उम्मीद करने वाले भ्रम में थे। बुद्धिजीवियों ने मार्ग दिखाया। स्वतंत्रता का कोर्इ विकल्प नहीं हो सकता। स्वशासन के बल पर ही हम अपनी कमजोरियों को दूर कर सकते हैं। इसके पहले भी भारत में बुद्धिजीवियों ने समय-समय पर 
सुधारवादी आन्दोलन चलाए। इसी का परिणाम था कि भारत अपवाद को छोड़कर कभी सांस्कृतिक रूप से परतंत्र नहीं हुआ।
कुछ बात है कि हस्ती
मिटती नहीं अपनी।
बात यही थी। गुलामी के लम्बे दौर में भी सांस्कृतिक चेतना के दीपकों को रौशन रखा गया।
हवा भी चलती रही
और दीप भी चलते रहे।
यह बुद्धिजीवियों की भूमिका थी, जिसने सदियों की गुलामी के बाद भी भारतीय सभ्यता-संस्कृति को दम तोड़ने नहीं दिया। जबकि विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताएं समय के थपेड़ों में विलुप्त हो गयीं।
लेकिन सम्राज्यवादी शकितयां आज भी सक्रिय हैं। प्रभावी हैं। केवल इनका स्वरूप बदला है। अब सांस्कृति आक्रमण हो रहा है। इसमें आक्रमणकारी प्रत्यक्ष नहीं है। यह हमारी जीवनशैली बदल रहा है। जो काम अंग्रेजों के प्रत्यक्ष शासन में बहुत धीमी गति से हो रहा था। वह अब बहुत तीव्र गति में चल रहा है। उपभोक्तावाद हमारे मन-मसितष्क पर हावी हो रहा है। बाजार दशा-दिशा तय कर रहा है। त्यौहारों का स्वरूप बदल रहा है। उसका आध्यातिमक महत्व कम हो रहा हैं बाजार उन्हें अपने मुनाफे के लिये बदल रहा है। अक्षय-तृतीया में किसका और किस प्रकार पूजन होना चाहिए, इसका मतलब नहीं रहा। बाजार बता रहे हैं- इस दिन सोना खरीदना जरूरी है। गरीब क्या करे। ठगा सा देख रहा है। दीपावली अपने नाम की सार्थकता खो रहा है। बाजार तरह-तरह की झालरों से आकर्षित कर रहा है। चीन भी इसमें पीछे नहीं। पटाखों का जखीरा सामाजिक शान का प्रतीक बन गया। गरीब अपनी झोपड़ी के सामने बैठकर आकाश की तरफ देखता है। कहीं कोर्इ चिंगारी उसके आशियाने को खाक न कर दे। इस भेदभाव पर कौन ध्यान देगा। गणेश-लक्ष्मी के पूजन में भी बाजार का हस्तक्षेप है। लगता है जीवन का उíेश्य केवल उपभोक्तावाद है। व्यकित की पहचान का यही आधार है। डिजाइनर कपड़े-सूट हमारी पहचान बनाते हैं। चार पहिया वाहन होना पर्याप्त नहीं। जितनी महंगी कार से चलो, उतने ही महत्वपूर्ण हो जाओगे।
जाहिर है कि उदारीकरण के इस दौर ने सामाजिक भेदभाव को अधिक गहरा किया है। अब यह बुद्धिजीवियों का दायित्व है कि वह सुधार का बीड़ा उठायें। नव सम्राज्यवाद का हमला घर-परिवार तक है। माता-पिता के लिये वर्ष में केवल एक दिन। वह भी केक, जाम और डांस के नाम रहता है। बुद्धिजीवी ही बता सकता है मातृ-पितृ ऋण का महत्व। इससे उऋण होने के लिये एक जीवन कम है। बुद्धिजीवियों को सक्रिय राजनीति में अपनी भूमिका तलाशनी होगी। उसका स्वरूप कुछ भी हो सकता है। अन्यथा राजनीति में अपराधी, माफिया, धन-बाहुबलियां का इसी प्रकार वर्चस्व बढ़ता रहेगा। नि:संदेह आज बुद्धिजीवियों की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है।

रसूखदारों को राहत देने वाला अध्यादेश

अध्यादेश की शक्ति प्रजातंत्र की मूल भावना से मेल नहीं रखती। संविधान सभा में  इस पर बहस हुई थी। कई सदस्यों ने इसे कार्यपालिका की निरंकुशता का प्रतीक मानकर विरोध किया था। लेकिन संविधान सभा ने व्यापक विचार विमर्श के बाद अध्यादेश का प्रावधान किया। जिस समय संसद का अधिवेशन न चल रहा हो, शीघ्रता से कोई विधेयक पारित कराना सम्भव न हो तथा राष्ट्र और जनहित के लिये किसी कानून की तत्काल आवश्यकता हो, तब कार्यपालिका अध्यादेश जारी कर सकती है। अध्यादेश कानून की भांति होता है। अध्यादेश जारी करने की शक्ति कार्यपालिका को दी गयी।
लेकिन संविधान निर्माताओं ने अध्यादेश प्रावधान के ऐसे दुरुपयोग की कल्पना नहीं की होगी। केन्द्र सरकार ने सजा प्राप्त राजनेताओं को राहत देने के लिये अध्यादेश जारी किया। सरकार के इस कार्य में  संवैधानिक पवित्रता को बनाये रखने की भावना नही  थी। इसमें राष्ट्र या जनहित का कोई मसला समाहित नहीं था। फौरी तौर पर दो मामले सामने थे। बताया जाता है कि सरकार तत्काल रूप में कांग्रेस के रशीद मसूद और राजद प्रमुख लालू यादव को राहत देना चाहती थी।
यह आम धारणा बन गयी है कि देश में रसूखदार लोग कानून से बच निकलते हैं। एक तो दशकों तक उन पर लगे आरोपो पर निर्णय नहीं होता। इसमें केवल न्यायिक प्रक्रिया की कमी नहीं है। जांच एजेंसियां आवश्यक प्रमाण जुटाने में लापरवाही दिखाती हैं। उन पर सरकार का दबाव होता है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है। वस्तुतः अध्यादेश के माध्यम से सरकार ने अपनी इसी नीति और नीयत को आगे बढ़ाया है। रशीद मसूद और लालू यादव पर लगे आरोप करीब दो दशक पुराने है। अनियमितता व बड़े घोटाले हुए। इस पूरी अवधि में ये लोग सत्ता या सदन के गलियारे मंे रहे। अब सदन में  इस प्रकार के लोगों की बड़ी संख्या में है। ए. राजा, कलमाड़ी, मधुकोड़ा आदि ऐसे मामलों के बड़े नाम हैं। न्यायिक निर्देया के बाद ही इन पर शिकंजा कसा था। अब सब पहले की तरह होता जा रहा है। ये सभी राजनीतिकी नई पारी के लिये तैयार हैं। न्यायपालिका ने दो वर्ष के सजायाफ्ताओं पर एक निर्णय दिया। सरकार उनके बचाव में आ गयी। वह इस अध्यादेश से क्या संदेश देना चाहती है। यही कि रसूखदार लोगों को कानून शिकंजे से बचाने के प्रत्येक संभव प्रयास किये जायेंगे। बेशक राजनीतिक मुकदमों को अलग रखना चाहिए। कई बार प्रदर्शन, आन्दोलन, धारा-144 के उल्लंघन आदि के मुकदमें लगते हैं। लेकिन घोटालों तथा अन्य गम्भीर अपराधों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। 
ऐसे में यह सरकार का दायित्व था कि अपराधी तत्वों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त करे। सरकार ने अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया। इसीलिए उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसने संसद और विधायिका से ऐसे सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने का आदेश पारित किया था, जिसे दो वर्ष या अधिक की सजा मिली हो। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने इस न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी बनाने के लिये अध्यादेश का सहारा लिया। सरकार को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। लेकिन इस मामले में प्रश्न सरकार की नीयत और नैतिकता को लेकर उठा है। 
आपराधिक या भ्रष्टाचार के सजायाफ्ताओं को बचाने में संप्रग सरकार को इतनी जल्दबाजी क्या थी। उसने पहले सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायरा की थी। जो स्वीकार नहीं की गयी। संसद के मानसून सत्र में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निष्प्रभावी बनाने के लिये संशोधन प्रस्ताव रखा था। इसमें जेल में बन्द व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर लगी रोक हटाने पर सभी दलों में आम सहमति थी। अतः यह प्रस्ताव पारित हो गया। लेकिन दो वर्ष के सजायाफ्ता की सदस्यता रद्द होने वाले निर्णय को निष्प्रभवी बनाने के लिये संशोधन प्रस्ताव रखा था। इसमें जेल में बन्द व्यक्ति के लिये संशोधान प्रस्ताव रखा था। इसमें जेल में बन्द व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर लगी रोक हटाने पर सभी दलों में  आम सहमति थी। अतः यह प्रस्ताव पारित हो गया। लेकिन दो वर्ष के सजायाफ्ता की सदस्यता रद्द होने वाले निर्णय को निष्प्रभावी बनाने पर आम सहमति नहीं बन सकी थी। सरकार का संशोधन प्रस्ताव राज्यसभा से पारित नहीं हो सका। सदन में सहमति न बनने के कारण इसे स्थायी समिति के पास भेजा गया। ऐसे में सरकार को स्थायी समिति की रिपोर्ट तथा संसदीय निर्णय का इंतजार करना चाहिए था। सरकार को उन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए था, जिन पर आम सहमति नहीं बन रही थी। सरकार की दलील थी कि निचली अदालत किसी सांसद या विधायक को दो वर्ष जेल की सजा दे, तो वह अपनी सदस्यता से वंचित हो जायेगा। लेकिन ऊंची अदालत उसे निर्दोष मानकर सजा से मुक्त कर दे, तब क्या होगा। तब उसकी सदन की समाप्त हुई सदस्यता बहाल नहीं होगी। संविधान में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। यह भी सम्भव है ऊंची अदालत से उसे निर्दोश करार देने से पहले उपचुनाव के माध्यम से रिक्त सीट भर ली जाए।
जाहिर है कि इस मसले पर दो गम्भीर बातों पर विचार होना चाहिए था। एक यह कि किस निर्दोष को परेशान न होना पड़े। दूसरा यह कि उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति कानून से बचते न रहे। पहले वाली बात प्रायः दुर्लभ होती है। कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं कि आरोप लगने और जांच शुरू होने से पहले ही कई राजनेताओं ने अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने निर्दोष साबित होने तक कोई पद ग्रहण न करन का संकल्प लिया था। जनसेवा या राजनीति ऐसे ही उच्च आदर्शों की मांग करती है। राजनेताओं को ऐसे त्याग के लिये तैयार रहना चाहिए। वह नौकरी पर निर्भर रहने वाले सरकारी मुलाजिम नहीं होता। आपराधिक मामले में किसी भी अदालत से दो वर्ष की सजा मिलना सामान्य बात नहीं होती। संसद और विधानसभा ऐसे लोगों से मुक्त होकर अपनी गरिमा बढ़ा सकती है। वह भविष्य में निर्दोष साबित हुए तो उनकी छवि में अधिक निखार दिखाई देगा। यदि ऊंची अदालत ने सजा को सही माना, तो समाज में संदेश जायेगा। यह संदेश विधि के शासन को प्रतिष्ठित करेगा। कानून से ऊपर कोई नहीं। रसूखदारों को मिलने वाली सजा का प्रशासन के निचले स्तर तक अच्छा संदेश जायेगा। उन्हें बचाने या संरक्षण देने का प्रयास अनैतिकता को बढ़ावा देगा।

Monday, 16 September 2013

विश्वकर्मा पूजा पर विशेष!

हिंदू धर्म में मानव विकास को धार्मिक व्यवस्था के रूप में जीवन से जोड़ने के लिए विभिन्न अवतारों का विधान
मिलता है। इन्हीं अवतारों में से एक भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का इंजीनियर माना गया है, अर्थात समूचे विश्व का ढांचा उन्होंने ही तैयार किया है। वे ही प्रथम आविष्कारक थे। हिंदू धर्मग्रंथों में यांत्रिक, वास्तुकला, धातुकर्म, प्रक्षेपास्त्र विद्या, वैमानिकी विद्या आदि का जो प्रसंग मिलता है, इन सबके अधिष्ठाता विश्वकर्मा माने जाते हैं। इस बार विश्वकर्मा पूजा 17 सितम्बर दिन मंगलवार को पड़ रही है|

विश्वकर्मा ने मानव को सुख-सुविधाएं प्रदान करने के लिए अनेक यंत्रों व शक्ति संपन्न भौतिक साधनों का निर्माण किया। इन्हीं साधनों द्वारा मानव समाज भौतिक चरमोत्कर्ष को प्राप्त करता रहा है। प्राचीन शास्त्रों में वैमानकीय विद्या, नवविद्या, यंत्र निर्माण विद्या आदि का उपदेश भगवान विश्वकर्मा ने दिया। माना जाता है कि प्राचीन समय में स्वर्ग लोक, लंका, द्वारिका और हस्तिनापुर जैसे नगरों के निर्माणकर्ता भी विश्वकर्मा ही थे।

माना जाता है कि विश्वकर्मा ने ही इंद्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पांडवपुरी, सुदामापुरी और शिवमंडलपुरी आदि का निर्माण किया। पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं भी इनके द्वारा निर्मित हैं। कर्ण का कुंडल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, शंकर का त्रिशूल और यमराज का कालदंड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है।

एक कथा के अनुसार यह मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम नारायण अर्थात् विष्णु भगवान क्षीर सागर में शेषशय्या पर आविर्भूत हुए। उनके नाभि-कमल से चतुर्मुख ब्रह्मा दृष्टिगोचर हो रहे थे। ब्रह्मा के पुत्र 'धर्म' तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव हुए।

कहा जाता है कि धर्म की वस्तु नामक स्त्री से उत्पन्न वास्तु सातवें पुत्र थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे। अपने पिता की भांति ही विश्वकर्मा भी आगे चलकर वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने। भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूप बताए जाते हैं। उन्हें कहीं पर दो बाहु, कहीं चार, कहीं पर दस बाहुओं तथा एक मुख और कहीं पर चार मुख व पंचमुखों के साथ भी दिखाया गया है। उनके पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ हैं।

यह भी मान्यता है कि ये पांचों वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे और उन्होंने कई वस्तुओं का आविष्कार भी वैदिक काल में किया। इस प्रसंग में मनु को लोहे से, तो मय को लकड़ी, त्वष्टा को कांसे एवं तांबे, शिल्पी ईंट और दैवज्ञ को सोने-चांदी से जोड़ा जाता है। हिंदू धर्मशास्त्रों और ग्रथों में विश्वकर्मा के पांच स्वरूपों और अवतारों का वर्णन मिलता है :

विराट विश्वकर्मा : सृष्टि के रचयिता

धर्मवंशी विश्वकर्मा : शिल्प विज्ञान विधाता और प्रभात पुत्र

अंगिरावंशी विश्वकर्मा : आदि विज्ञान विधाता और वसु पुत्र

सुधन्वा विश्वकर्मा : विज्ञान के जन्मदाता (अथवी ऋषि के पौत्र)

भृंगुवंशी विश्वकर्मा : उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र)

विश्वकर्मा के विषय में कई भ्रांतियां हैं। बहुत से विद्वान विश्वकर्मा नाम को एक उपाधि मानते हैं, क्योंकि संस्कृत साहित्य में भी समकालीन कई विश्वकर्माओं का उल्लेख है। कुछ विद्वान अंगिरा पुत्र सुधन्वा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं, तो कुछ भुवन पुत्र भौवन विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं।

ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त के नाम से 11 ऋचाएं लिखी हुई हैं। यही सूक्त यजुर्वेद अध्याय 17, सूक्त मंत्र 16 से 31 तक 16 मंत्रों में आया है। ऋग्वेद में विश्वकर्मा शब्द इंद्र व सूर्य का विशेषण बनकर भी प्रयुक्त हुआ है। महाभारत के खिल भाग सहित सभी पुराणकार प्रभात पुत्र विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं। स्कंद पुराण प्रभात खंड के इस श्लोक की भांति किंचित पाठभेद से सभी पुराणों में यह श्लोक मिलता है :

बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी।

प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च।

विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति: ।।16।।

महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रह्मविद्या जानने वाली थी, वह अष्टम वसु महर्षि प्रभास की पत्नी बनी और उससे संपूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ। भारत में शिल्प संकायों, कारखानों और उद्योगों में प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा पूजनोत्सव का आयोजन किया जाता है।

Saturday, 14 September 2013

सफलता के शिखर!

बहुत समय पहले की बात है !! एक सरोवर में बहुत सारे मेंढक रहते थे !! सरोवर के बीचों -बीच एक बहुत पुराना धातु का खम्भा भी लगा हुआ था जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने लगवाया था !! खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिलकुल चिकनी थी !!
एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों ना एक रेस करवाई जाए !! रेस में भाग लेने वाली प्रतियोगीयों को खम्भे पर चढ़ना होगा और जो सबसे पहले एक ऊपर पहुच जाएगा वही विजेता माना जाएगा !! रेस का दिन आ पंहुचा !! चारो तरफ बहुत भीड़ थी !! आस -पास के इलाकों से भी कई मेंढक इस रेस में हिस्सा लेने पहुचे !! माहौल में सरगर्मी थी !! हर तरफ शोर ही शोर था !!
रेस शुरू हुई, लेकिन खम्भे को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी मेंढक को ये यकीन नहीं हुआ कि कोई भी मेंढक ऊपर तक पहुंच पायेगा !! हर तरफ यही सुनाई देता - "अरे ये बहुत कठिन है !! वो कभी भी ये रेस पूरी नहीं कर पायंगे !! सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं !! इतने चिकने खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता !!" और यही हो भी रहा था, जो भी मेंढक कोशिश करता, वो थोड़ा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता !!
कई मेंढक दो -तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे !! पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी - "ये नहीं हो सकता , असंभव !!" और वो उत्साहित मेंढक भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास छोड़ दिया !!
लेकिन उन्ही मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था, जो बार -बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था !! वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और अंततः वह खम्भे के ऊपर पहुच गया और इस रेस का विजेता बना !! उसकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ !! सभी मेंढक उसे घेर कर खड़े हो गए और पूछने लगे - "तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया, भला तुम्हे
अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुमने ये विजय कैसे प्राप्त की ??" तभी पीछे से एक आवाज़ आई - "अरे उससे क्या पूछते हो , वो तो बहरा है !!"
अक्सर हमारे अन्दर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की काबीलियत होती है, पर हम अपने चारों तरफ मौजूद नकारात्मकता की वजह से खुद को कम आंक बैठते हैं और हमने जो बड़े-बड़े सपने देखे होते हैं उन्हें पूरा किये बिना ही अपनी ज़िन्दगी गुजार देते हैं !! आवश्यकता इस बात की है हम हमें कमजोर बनाने वाली हर एक आवाज के प्रति बहरे और ऐसे हर एक दृश्य के प्रति अंधे हो जाएं !! और तब हमें सफलता के शिखर पर पहुँचने से कोई नहीं रोकपायेगा !!

हिंदी दिवस विशेष !

हिंदी भारोपीय (भारतीय-यूरोपीय) परिवार की एक ऐसी भाषा है जो आम भारतीयों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। संख्या बल की दृष्टि से यह दुनिया में सर्वाधिक लोगों के बीच समझी जाने वाली भाषा है। भारोपीय परिवार की भाषा होने के कारण यह भारतीय सीमा के बाहर भी समझी जाती है। संस्कृत शब्दों की बहुलता के कारण यह देश के भीतर संपर्क का बेहतर माध्यम मानी जाती है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही आजाद देश की भाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किए जाने की वकालत की जाने लगी थी। उस समय करीब-करीब देश के हर नेता ने हिंदी के महत्व को स्वीकार किया था, किंतु दुर्भाग्यवश हिंदी को वह सम्मानजनक आसन दिला पाने में वे विफल रहे।
हिंदी दिवस: कारण और महत्व
स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी (खड़ी बोली) ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण
निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन विभिन्न शासकीय, अशासकीय कार्यालयों, शिक्षा संस्थाओं आदि में विविध गोष्ठियों, सम्मेलनों, प्रतियोगिताओं तथा अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कहीं-कहीं हिंदी पखवाड़ा तथा राजभाषा सप्ताह भी मनाए जाते हैं।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 सितंबर, 1949 के दिन बहस में भाग लेते हुए कहा था कि किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता। कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती। भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए।
यह बहस 12 सितंबर, 1949 को शाम चार बजे से शुरू हुई और 14 सितंबर, 1949 के दिन समाप्त हुई थी। 14 सितंबर की शाम बहस के समापन के बाद भाषा संबंधी संविधान के तत्कालीन भाग 14 (क) और वर्तमान भाग 17 में हिंदी का उल्लेख है।
संविधान सभा की भाषा विषयक बहस लगभग 278 पृष्ठों में मुद्रित हुई। इसमें डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और गोपाल स्वामी आयंगार की महती भूमिका रही। बहस के बाद यह सहमति बनी कि संघ की भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। देवनागरी में लिखे जाने वाले अंकों और अंग्रेजी में लिखे जाने वाले अंकों को लेकर बहस हुई और अंतत: आयंगार-मुंशी फार्मूला भारी बहुमत से स्वीकार कर लिया गया।
स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर काफी विचार-विमर्श के बाद जो निर्णय लिया गया, वह भारतीय संविधान के अध्याय 17 के अनुच्छेद 343 (1) में इस प्रकार वर्णित है: संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय ही होगा।
राजभाषा के प्रश्न से अलग हिंदी की अपनी एक विशाल परंपरा है। साहित्य और संचार के क्षेत्र में भी हिंदी का दबदबा देखने को मिलता है। तकनीक की क्रांति ने हिंदी को बल दिया है तो इसे सीमा के बाहर भी फैलने का अवसर प्रदान किया है।

Wednesday, 28 August 2013

'कृष्ण' एक मानवीय शक्ति

हाल ही में एक भारतवंशी ब्रितानी शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं और पुरातात्विक व भाषाई साक्ष्यों के आधार पर दावा किया है कि भगवान कृष्ण हिंदू मिथक और पौराणिक कथाओं के काल्पनिक पात्र न होते हुए एक वास्तविक पात्र थे। सच्चाई भी यही है। ब्रिटेन में न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ़ मनीष पंडित ने अपने अनुसंधान में बताया है कि टेनेसी के मेम्फिस विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर डॉ़ नरहरि अचर ने खगोल विज्ञान की मदद से महाभारत युद्घ के काल का पता लगाया है। कृष्ण का जन्म 3112 बीसी में हुआ। डॉ़ पंडित द्वारा बनाई गई दस्तावेजी फिल्म ‘कृष्ण इतिहास और मिथक’ में बताया गया है कि पांडवों और कौरवों के बीच महाभारत की लड़ाई ईसा पूर्व 3067 में हुई थी। इन गणनाओं के अनुसार कृष्ण का जन्म ईसा पूर्व 3112 में हुआ था, यानी महाभारत युद्घ के समय कृष्ण की उम्र 54-55 साल की थी। महाभारत में 140 से अधिक खगोलीय घटनाओं का विवरण है। इससे स्पष्ट होता है कि कृष्ण कोई अलौकिक या दैवीय शक्ति न होकर एक मानवीय शक्ति थे।

कृष्ण बाल जीवन से ही जीवनपर्यंत सामाजिक न्याय की स्थापना और असमानता को दूर करने की लड़ाई दैव व राजसत्ता से लड़ते रहे। वे गरीब की चिंता करते हुए खेतीहर संस्कृति और दुग्ध क्रांति के माध्यम से ठेठ देशज अर्थव्यवस्था की स्थापना और विस्तार में लगे रहे। सामारिक दृष्टि से उनका र्शेष्ठ योगदान भारतीय अखंडता के लिए उल्लेखनीय रहा। कृष्ण जड़ हो चुकी उस राज और देव सत्ता को भी चुनौती देते हैं, जो जन विरोधी नीतियां अपनाकर लूट तंत्र और अनाचार का हिस्सा बन गए थे? भारतीय लोक के कृष्ण ऐसे परमार्थी थे जो चरित्र भारतीय अवतारों के किसी अन्य पात्र में नहीं मिलता। कृष्ण की विकास गाथा अनवरत साधारण मनुष्य बने रहने में निहित रही। 16 कलाओं में निपुण इस महानायक के बहुआयामी चरित्र में वे सब चालाकियां बालपन से ही थीं, जो किसी चरित्र को वाक्पटु और उद्दंडता के साथ निर्भीक नायक बनाती हैं, लेकिन बाल कृष्ण जब माखन चुराते हैं तो अकेले नहीं खाते, अपने सब सखाओं को खिलाते हैं और जब यशोदा मैया चोरी पकड़े जाने पर दंड देती हैं तो उस दंड को अकेले कृष्ण झेलते हैं। चरित्र का यह प्रस्थान बिंदु किसी उदात्त नायक का ही हो सकता है।


कृष्ण का पूरा जीवन समृद्घि के उन उपायों के विरुद्घ था, जिनका आधार लूट और शोषण रहा। शोषण से मुक्ति, समता व सामाजिक समरसता से मानव को सुखी और संपन्न बनाने के गुर गढ़ने में कृष्ण का चिंतन लगा रहा। इसीलिए कृष्ण जब चोरी करते हैं, स्नान करती स्त्रियों के वस्त्र चुराते हैं, खेल-खेल में यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कालिया नाग का मान र्मदन करते हैं, उनकी वे सब हरकतें अथवा संघर्ष उत्सवप्रिय हो जाते हैं। नकारात्मकता को भी उत्सवधर्मिता में बदल देने का गुर कृष्ण चरित्र के अलावा दुनिया के किसी इतिहास नायक के चरित्र में विद्यमान नहीं हैं?


भारतीय मिथकों में कोई भी कृष्ण के अलावा ईश्वरीय शक्ति ऐसी नहीं है जो राजसत्ता से ही नहीं उस पारलौकिक सत्ता के प्रतिनिधि इन्द्र से विरोध ले सकती हो जिसका जीवनदायी जल पर नियंत्रण था? यदि हम इन्द्र के चरित्र को देवतुल्य अथवा मिथक पात्र से परे मनुष्य रूप में देखें तो वे जल प्रबंधन के विशेषज्ञ थे, लेकिन कृष्ण ने रूढ़, भ्रष्ट व अनियमित हो चुकी उस देवसत्ता से विरोध लिया, जिस सत्ता ने इन्द्र को जल प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी हुई थी और इन्द्र जल निकासी में पक्षपात बरतने लगे थे। किसान को तो समय पर जल चाहिए अन्यथा फसल चौपट हो जाने का संकट उसका चैन हराम कर देता है। कृष्ण के नेतृत्व में कृषक और गौ पालकों के हित में यह शायद दुनिया का पहला आंदोलन था, जिसके आगे प्रशासकीय प्रबंधन नतमस्तक हुआ और जल वर्षा की शुरुआत किसान हितों को दृष्टिगत रखते हुए शुरू हुई।


आज नारी नर के समान स्वतंत्रता और अधिकारों की मांग कर रही है, लेकिन कृष्ण ने तो औरत को पुरुष के बराबरी का दर्जा द्वापर में ही दे दिया था। राधा विवाहित थी, लेकिन कृष्ण की मुखर दीवानी थी। ब्रज भूमि में स्त्री स्वतंत्रता का परचम कृष्ण ने फहराया। जब स्त्री चीर हरण (द्रोपदी प्रसंग) के अवसर पर आए तो कृष्ण ने चुनरी को अनंत लंबाई दी। स्त्री संरक्षण का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण दुनिया के किसी भी साहित्य में नहीं है? इसीलिए वृंदावन में यमुना किनारे आज भी पेड़ से चुनरी बांधने की परंपरा है। जिससे आबरू संकट की घड़ी में कृष्ण रक्षा करें।



प्रमोद भार्गव

Saturday, 3 August 2013

भारत की आंखों से दुनिया देखेगी ब्रह्मांड

बेंगलुरु।।सौ.  इकनॉमिक टाइम्स |जब टी. हरि ने 1.2 अरब डॉलर के थर्टी मीटर टेलीस्कोप (टीएमटी) के बारे में सुना, तो उन्हें इसमें बिजनेस की भरपूर संभावनाएं दिखीं। मुरली पांडिचेरी की कंपनी जनरल ऑप्टिक्स एशिया लिमिटेड (गोल) को हेड करते हैं। यह स्पेस और डिफेंस सेक्टर के लिए खास कंपोनेंट बनाती है। हालांकि, इसके लिए कॉन्ट्रैक्ट प्रॉजेक्ट में पार्टनर देश की कंपनियों को दिया जा रहा था। ऐसे में हरि कुछ नहीं कर सकते थे। पिछले हफ्ते उनकी यह दिक्कत दूर हो गई, जब इंडिया इस प्रॉजेक्ट में 10 फीसदी यानी 1,000 करोड़ रुपए का पार्टनर बना। अब तीन भारतीय कंपनियां- गोल, बेंगलुरु की अवसराला और गोदरेज ऐंड बॉयस टेलीस्कोप के लिए 700 करोड़ के कंपोनेंट बनाएंगी। यह जानकारी सरकारी अधिकारियों ने दी है।

ये कंपनियां हवाई में लगने वाले टेलीस्कोप के लिए जरूरी कंपोनेंट बनाएंगी। एस्ट्रोनॉमी के क्षेत्र में यह अब तक के अहम प्रॉजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है। इस टेलीस्कोप के लिए ऐसी टेक्नॉलजी का इस्तेमाल होगा, जो अभी हैं ही नहीं। मुरली ने कहा, 'इससे ऐसी टेक्नॉलजी डिवेलप करने में मदद मिलेगी, जो दुनिया के कुछ देशों के पास होगी।' इस प्रॉजेक्ट में अमेरिका, जापान, चीन और कनाडा भी पार्टनर हैं। अब तक जितने बड़े टेलीस्कोप बने हैं, टीएमटी उनसे तीन गुना बड़ा होगा। यह सबसे महंगा भी होगा। इस तरह के कई टेलीस्कोप दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लगाने की योजना बन रही है। यह वैसे ऑब्जेक्ट्स की भी तस्वीर ले सकेगा, जो अभी संभव नहीं है।

दूसरे स्टार के प्लैनेट की इमेज भी कैप्चर कर सकेगा। इससे यूनिवर्स के बारे में हमारी समझ बेहतर होगी। भारत सरकार इस प्रॉजेक्ट में टीएमटी इंडिया नाम की एजेंसी के जरिए 1,000 करोड़ रुपए इन्वेस्ट करेगी। यह प्राइवेट कंपनियों को रुपए में पेमेंट करेगी। भारतीय कंपनियां जो कंपोनेंट बनाएंगी, उन्हें पहले अमेरिका के पासाडेना भेजा जाएगा। वहां से ये पार्ट्स हवाई भेजे जाएंगे, जहां टेलीस्कोप बनाया जा रहा है। 30 मीटर का टेलीस्कोप बनाना हंसी का खेल नहीं है। इसके लिए 30 मीटर के डायमीटर वाले सिंगल मिरर की जरूरत पड़ेगी। इसलिए पहले मिरर को कंपोनेंट में बांटा जाएगा।